“श्री राम द्वारा शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश”

शास्त्रों में वर्णित है कि सतयुग में भक्त प्रह्लाद ने सबसे पहले नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। यह उपदेश उन्होंने अपने पिता हिरण्यकश्यप को दिया था ,  हिरण्यकश्यप ईश्वर को नहीं मानते थे।  जीवन के सत्य से अवगत कराने के लिए भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। 

इसके बाद भगवान श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। यह बात त्रेता युग की है।रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में नवधा भक्ति का उल्लेख है। भगवान श्रीराम को चौदह वर्षों का वनवास मिला था। वनवास के दौरान भगवान श्रीराम की भेंट माता शबरी से हुई थी। उस समय माता शबरी ने जूठे बेर खिलाकर भगवान श्रीराम का स्वागत किया था। यह माता शबरी के भगवान राम के प्रति प्रेम और स्नेह के भाव को दर्शाता है। उस समय माता शबरी जूठे बेर खिलाने के लिए कुंठित भी हुई थी। तब भगवान श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देकर दुविधा दूर की थी।

श्री राम ने नौ प्रकार की भक्ति बताईं।

नवधा भक्ति क्या है?

नवधा भगतिक‌हऊं तोही पाही। सावधान सुनु धरु मन माही।
प्रथम भगति संतन कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।


मैं तुझे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूॅं। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहले भक्ति है संतों का सत्संग।
दूसरी भक्ति है मेरे कथा -प्रसंग में प्रेम।।


गुर पद पंकज सेवा तिसरि भगति अमान।
चौथी भगति मम गुन गन करई कपट तजि गाण।


तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गाण करें।।


मंत्र जाप मम ढृढ बिश्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकाशा।
छठ दम सील बिरति बहू करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।


मेरे मंत्र का जाप और मुझ में ढृढ विश्वास_ यह पांचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील(अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के आचरण में लगे रहना।


सातवॅं सम मोहि माय जग देखा। मोतें संत अधिक करी लेखा।
आठव जथालाभ संतोषा। सपनेहुॅं नहिं देखई परदोषा।


सातवीं भक्ति है जगत भर को समभाव से मुझ में ओतप्रोत(राम मय) देखना और संतो को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए देशों को ना देखना।


नवम सरल सब सुन छल हीना। मम भरोस हियॅं हरष न दीना
नव महुॅं एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई।।


नवीं भक्ति है सरलता और सब के साथ कपट रहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य(विषाद) का न होना। इन नावों में से जिनके  एक भी होती है, वह स्त्री -पुरुष, जड़- चेतन कोई भी हो।


सोई अतिसय प्रिय भामिनी मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
जोगी वृंद दुरलभ। गतिजोई । तो कहूं आज सुलभ भई सोई।।


हे भामिनी! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ हैं। अतऐव जो गति योगियो को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।।

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